Newsflash
We have launched a special section featuring transcripts and more from radio programs for the enjoyment of fans. Thanks a lot to Sujoy Chatterjee, Ramaswamy and other contributors to the section. If you wish to provide more such content or help in posting transcripts please contact the administrator. This new section canbe accessed by clicking on Radio Se in the Specials Menu. Enjoy! You can also reach it by clicking Radio Se |
| Gulzar sahab's First Hindi Film Song |
|
|
|
| Written by shishir krishna sharma |
|
It is widely believed that Gulzar wrote his first song for the film 'Bandini' (1963) which was produced and directed by Bimal Roy. This song 'mora gora ang lai le' was sung by Lata and composed by S.D.Burman. Amazingly Gulzar never refuted this, for reasons best known to him. Fact is that prior to 'mora gora ang lai le', he had written 4 songs for the film 'Shriman Satyawadi' which was released in 1960. This film was produced by Mahipatrai Shah and directed by S.M.Abbas. Composed by Dattaram, these songs were -
2. kyoon uda jaata hai aanchal - Suman Kalyanpur
3. Rut albela mast samaa - Mukesh
4. Ek baat kahoon walaah - Mukesh, Suman Kalyanpur, Mahendra Kapoor, Chorus
According to "Hindi Film Geetkosh" (part-3) compiled by Mr.Harmindar Singh Hamraz, in the same year as Shriman Satyawadi i.e. in 1960, Gulzar sahab also wrote one song (" ye duniya hai taash ke patte" as told by Mr.Naqsh Layallpuri) in "choron ki baraat" (music by manohar) and 4 songs in "diler haseena" (music by Iqbal). Coincidentally both these were stunt movies and are treated as C-graders. Gulzar, whose actual name is Sampooran Singh Kalra, wrote these songs under the pen name Gulzar Deenvi. It should be noted that he was born in Deena, Jhelum District, now in Pakistan. In the year 1961 he wrote another song "Ganga aaye kahaan se..." in "kabuliwala" (music - Salil Chowdhary) but now his pen-name had reduced to "Gulzar". this clearly indicates that "mora gora ang lai le" (Bandini-1963) was NOT his first song as is believed and what he also has never refuted. On the other side, truth behind "mora gora rang..." is again something different as even this song isn't completely authored by Gulzar. To know the truth please click on the following link provided (in the comments below) by an ardent Gulzar fan and founder of "gulzaronline.com", Mr. Pavan Jha, thanks to Mr.Jha. It is also known that Gulzar wrote a Hindi song the same year as Shriman Satyawadi i.e. 1960 for the Bengali movie Dui Bechara which had music by veteran composer Bhupen Hazarika. This was recorded when Gulzar sahab was trying his luck in Kolkata. This lovely song, Karo Na Phere Gali Ke Mere was sung very wonderfully by Geeta Dutt and Manna Dey. Their fans had been searching for this song for a long time and was shared recently by our friend Dr Jyoti Prakas Guha. Here is the lovely song for your listening pleasure:-
|
Specials














Comments
Also how did you missed out a few more films of Gulzar Deenvi like "Diler Hasina" & "Choron Ki Baaraat"..
Can provide a lot more details how this credits issue happened.. but one need a good intent to understand why and how it happened!
goo.gl/M7GaI
goo.gl/WR1XW
but then to each of his own!
अगर इन प्रश्नों का उत्तर “हां” है, तो इस आलेख पर बहस की गुंजाईश ही नहीं बनती. जानकारियां पाने के लिए हम हमेशा तैयार हैं और हमने परिपूर्ण होने का दावा कभी नहीं किया है.
जहां तक प्रश्न है नूतन, मोहनीश, नेहा देसाई और आदरणीय हमराज़ साहब के ज़िक्र का, और अगर उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर “हां” है, तो ये सब मूल विषय से भटकने वाली बातें हैं.
सम्मानसहित एक निवेदन आपसे और करना चाहूंगा, प्रश्नों की झड़ी किसी भी समस्या का समाधान नहीं है.
बिना किसी पूर्वाग्रह के, स्वस्थ मन के साथ आप इस मंच पर आएं, आपका स्वागत है.
hope u wud take these suggestions positively and won't ignore these as result of just a time-pass.
regards.
खूबसूरत फ़ूलॊं के लिये धन्यवाद!यकीं कीजिये मुझे इन से चोट नहीं लगी है मगर अपनी बात कहने का सम्बल मिला है!
इससे पहले कि मैं इन सब बातों का विस्तार से जवाब दूं पहले ये जाहिर कर दूं कि मेरे लिये आप बहुत सम्माननीय नाम हैं अनमोल फ़नकार के अस्तित्व से भी पहले से जब से आपको पढ़ रहा हूं और भले ही ये संवाद, ये बहस किसी भी स्तर पे पहुंचे, मेरी ओर से कोई भी जवाब व्यकितगत नहीं होगा और इस विषय पर आपकी कुछ भी दलील हो, किसी भी हद तक, मेरे लिये आपके सम्मान में कमी नहीं आयेगी। हाँ अगर आपको कुछ व्यकितगत लगे तो विश्वास कीजिये वो आपके लिये नहीं कहा गया है, बल्कि पत्रकारों के लिये in general वक्तव्य होगा!
मुझे किसी भी स्तर पे लगा कि ये बहस व्यक्तिगत जा रही है तो मैं चुप रह कर अपनी हार स्वीकारना पसंद करूंगा बजाय इसके कि बहस जारी रहे।
मिलता हूं!
मैं अभी भी 'गुलज़ार दीनवी' से सम्बन्धित अपने प्रश्नों के उत्तर जानने को उत्सुक हूं. कृपया मेरी बातों को व्यक्तिगत न लें, मेरी मंशा किसी भी प्रकार से आपको ठेस पहुंचाने की नहीं है. आईये, क्यों न हम मिलकर इस आलेख से संबंधित उलझनों को सुलझाएं? मुझे आपके सकारात्मक उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी.
पहले तो मैं ये बता दूं कि इस सवाल क जवाब मैं कई फ़ोरम्स पे पहले भी कई बार दे चुका हूं आप चाहें ढूंढ सकते हैं.. आपके सवालों की तरह ही मेरे जवाब भी बासी लगते हैं मुझे.. बार बार वही बात दोहराने की बहुत श्रद्धा बाकी नहीं रह गयी है खासकर मंशा देख कर! खैर कुछ बातें दोहरा देता हुं.. गुलज़ार साब ने इस बात के लिये कभी मना नहीं किया कि जिस गुलज़ार दीनवी के ये गीत क्रेडिटेड हैं वे, वे नहीं हैं.. अगर ऐसी कोई समस्या होती तो मैं खुद आपको वो लिंक क्यूं देता? :)
इन गीतों के क्रेडिट को लेकर उनकी समस्या दूसरी है.. बात उन दिनों की है जब वे कुंवरलॉज में रहते थे और दो तीन स्ट्रगलिंग निर्माता निर्देशक भी उसी कमरे मे साथ रहते थे.. श्रीमान सत्यवादी में और एक और फ़िल्म थी उसमें गुलशन बावरा मुख्य गीतकार थे... स्टोरी सिटिंग्स उसी कमरे पे होती थीं और म्युसिक सिटिंग्स भी.. लिखने का शौक था इसलिये सिटिंग्स में भाग ले लेते थे और अपनी ओर से दोस्ती यारी में कई सलाह भी देते थे.. इस बात की तसदीक गुलशन जी भी कर चुके हैं.. तो इनका नाम भी दो-एक बार क्रेडिट्स में दिया गया उस रचना के लिये जो वे अपनी सम्पूर्ण रचना नहीं मानते। बकौल गुलज़ार साब "मैने उन्हें बनाया नहीं है, सिर्फ़ हाथ लगाया है"। अगर वे अपना पहला सम्पूर्ण गीत बन्दिनी का मानते हैं तो मुझे उनके दृष्टिकोण में कोई बुराई नज़र नहीं आती।
1. गुलज़ार दीनवी के नाम ऑन रेकॉर्ड 'श्रीमान सत्यवादी' में चार, 'चोरों की बारात' में एक और 'दिलेर हसीना' में चार गीत हैं?
2. गुलज़ार दीनवी गुलज़ार साहब का ही पूर्व-नाम है?
यदि हां, तो आश्चर्य, उपरोक्त गीतों को आपने अपनी वेबसाईट में क्यों शामिल नहीं किया. मुझे इस बात का अफ़सोस भी है कि आप अभी तक स्पष्ट उत्तर देने से बच रहे हैं. माफ़ी चाहता हूं, अगर अपने पहले के सभी कमेण्ट्स पर एक बार फिर से गौर करेंगे तो शायद आप भी नहीं समझ पाएंगे कि इस बहस की शुरुआत के पीछे आपका मक़सद क्या था. रही बात 'बासी सवाल' की तो मैं आपको अधिकार नहीं दे सकता कि आप मेरे सवालों को बासी करार दें. और अगर आप उकता चुके हैं अपने ‘बासी जवाबों’ से तो आपको किसी ने विवश भी तो नहीं किया था इस बहस को शुरु करने के लिए, जिसमें 'टाईमपास' जैसे शब्दों का प्रयोग करके आपने न केवल अपने काम के प्रति गंभीर पत्रकारों का, वरन उन वरिष्ठ कलाकारों का भी अपमान किया है जिनके लिए ऐसे पत्रकार काम कर रहे हैं.
आपने दो जगह कमेण्ट में लिखा है –
1 but one need a good intent to understand why and how it happened!
2. बार बार वही बात दोहराने की बहुत श्रद्धा बाकी नहीं रह गयी है खासकर मंशा देख कर!
कृपया स्पष्ट करें, हमारी intension / मंशा पर आपको किस प्रकार का संदेह है, और क्यों?
आशा करता हूं बजाय शब्दजाल बुनने के, आप उपरोक्त सभी प्रश्नों का सटीक और संक्षिप्त उत्तर (हां या ना) देंगे. तब तक के लिए मैं अपनी ओर से इस बहस को विराम देता हूं, किंतु गुलज़ार दीनवी के लिखे गीतों से संबंधित जानकारियां अवश्य जुटाता रहूंगा. मेरा यक़ीन कीजिए, मैं इस दिशा में गंभीर हूं और 'टाईमपास' तो कतई नहीं कर रहा हूं.
अगर मेरे ’टाइम पास’ से आपको ठेस लगी है तो माफ़ी चाहता हूं.. मेरा इरादा व्यक्तिगत तो बिल्कुल नहीं था.. हां पत्रकारों के बारे में मेरी राय अब भी वही है। मैनें आपकी सभी बातों के जवाब दे दिये हैं.. आपने जो दो सवाल दिये हैं उनका भी सीधा उत्तर दे दिया है जिसमें शब्दजाल की गुंजाइश ही नहीं है... वैसे भी आपको अगर जानकारी जुटानी है तो हमराज़ साब के गीतकोश मंगवा लीजीये जिसमें ये सारी जानकारी 10-12 वर्षों से पहले से मौजूद है... या इंटरनेट पर कई फ़ोरम्स में कई बार दोहराई जा चुकी है.. हाँ अगर आप इस जानकारी के अतिरिक्त कुछ नया लाते हैं तो आपका स्वागत है!
क्या आप सहमत हैं कि -
1. गुलज़ार दीनवी के नाम ऑन रेकॉर्ड 'श्रीमान सत्यवादी' में चार, 'चोरों की बारात' में एक और 'दिलेर हसीना' में चार गीत हैं?
2. गुलज़ार दीनवी गुलज़ार साहब का ही पूर्व-नाम है?
3.यदि हां, तो उपरोक्त गीतों को आपने अपनी वेबसाईट में शामिल क्यों नहीं किया?
4. जैसा कि आपने दो जगह कमेण्ट में लिखा है – “but one need a good intent to understand why and how it happened!” और “बार बार वही बात दोहराने की बहुत श्रद्धा बाकी नहीं रह गयी है खासकर मंशा देख कर!” - तो हमारी intension / मंशा पर आपको किस प्रकार का संदेह है, और क्यों?
आप भले ही दावा करें कि इन प्रश्नों का उत्तर आप दे चुके हैं किंतु मुझे तो आपके किसी भी कमेण्ट में ऐसा कुछ नज़र नहीं आया, मेरा अज्ञान ! शायद पाठकों को दिखा हो कुछ. खैर, एक बात और, जैसा कि शुरुआत में आपके प्रश्नों की बौछार से ध्वनित हुआ, गुलज़ार साहब ने सबसे पहले “मोरा गोरा अंग” लिखा, रेकॉर्ड कराया लेकिन नूतन के गर्भवती हो जाने की वजह से फ़िल्म टल गयी. गुलज़ार साहब के गीत वाली ‘काबुलीवाला’ (1961) पहले प्रदर्शित हुई. मोहनीश फ़रवरी 1963 में जन्मे....पवन जी, सन 1960 से 1963 तक क़रीब 3 साल का गर्भधारण?...शरीर विज्ञान के भी कुछ नियम होते हैं या नहीं?
ये सत्य है कि “गुरु गोबिन्द दोऊ खड़े...बलिहारी गुरु आपने गोबिन्द दियो बताय”...किंतु ये भी उतना ही सत्य है कि गुरु कभी भी गोबिन्द का स्थान नहीं ले सकते, क्योंकि गुरु मनुष्य हैं और मनुष्य होने के नाते उनमें भी तमाम मानवीय कमज़ोरियां हैं, जैसे “मीठा मीठा गप्प, कड़वा कड़वा थू”...जैसे "हाथ लगाने भर" का बहाना बनाकर अपने नाम पर दर्ज “कमज़ोर” गीतों को ठुकरा देना और “वाकई हाथ भर लगाए” गीत को अपना बताकर तालियां बटोरना. कृपया ध्यान दें, “वाकई हाथ भर लगाए” वाली ये बात मैं आप ही के दिए लिंक के आधार पर कह रहा हूं.
एक प्रश्न और, “इब्नबतूता” के बारे में आपके क्या विचार हैं?
आपके सटीक और संक्षिप्त उत्तरों की प्रतीक्षा हमेशा से थी और अभी भी है. देखें कब खत्म होती है ये प्रतीक्षा. तब तक मैं आप ही के द्वारा शुरु की गयी इस बहस में पूरी शिद्दत और पूरी अडिगता के साथ जुटा रहूंगा जिसे अब आप “बासी सवाल-जवाब” का बहाना बनाकर अनिर्णित छोड़ देना चाहते हैं, हालांकि आपको किसी ने विवश नहीं किया था इस आधारहीन बहस को जन्म देने के लिए. बड़े-बुज़ुर्गों ने ग़लत नहीं कहा है, "पहले तोलो, तब बोलो" वरना स्थितियां हास्यास्पद ही नहीं दयनीय भी हो जाती हैं!!!-:)-:)-:)
मेरी शुभकामनाएं !!!
हिन्दी फ़िल्म गीतकोश (खण्ड – 3 / वर्ष 1951 से 1960)
पृष्ठ : 519 / फ़िल्म क्रमांक 1037
फ़िल्म : चोरों की बारात / वर्ष – 1960 / बैनर – के.पिक्चर्स / निर्माता : चरणजीत / निर्देशक : प्रदीप नय्यर / संगीतकार : मनोहर / गीतकार : नक़्श लायलपुरी, फारुख़, ग़ाज़ी, साजन बिहारी, गुलज़ार दीनवी
कलाकार : अमरनाथ, नाज़ी, शेख, शकीलाबानो भोपाली, नेमो, मीना, दर्शन, राजन हक्सर, ग़ुलाब
गीत :
1. रास्ते में बेइरादा अरे उनसे नज़र मिल गयी – (स्वर - ???)
2. उई समा (रामा???) ज़ुल्म हुआ ज़ुल्मी नज़र दिल मार गयी – (स्वर - ???)
3. जाने और अंजाने आज कहीं दीवाने घूमने निकले – सुमन कल्याणपुर, महेन्द्र कपूर
4. ले मार हाथ पे हाथ गोरिए कर ले पक्की बात (नक़्श लायलपुरी) – .....वही.....
5. हम सलामत रहें दिलदार बहुत मिलते हैं – जॉनी बाबू क़व्वाल, साथी
6. ये दुनिया है ताश के पत्ते इसको करो सलाम – महेन्द्र कपूर, बलबीर
नक़्श साहब के अनुसार गीत सं.6 (ये दुनिया है ताश के पत्ते...) गुलज़ार साहब ने लिखा था.
पृष्ठ : 530 / फ़िल्म क्रमांक 1059
फ़िल्म : दिलेर हसीना / वर्ष – 1960 / बैनर – भगवती प्रोडक्शंस / निर्माता : मोहन लाल / निर्देशक : प्रदीप नय्यर / संगीतकार : इक़बाल / गीतकार : ग़ाज़ी, गुलज़ार दीनवी
कलाकार : अमरनाथ, मंजु, भगवान, शशिमाला, नज़ीर काश्मीरी, कथाना, मीना, नरूला, वृन्दा
गीत :
1. कैसी है बेबसी दिल रोए लब पर हंसी – (स्वर - ???)
2. ओ ओ ओ मनचली अकड़ के चले थे बिगड़ के चले थे – महेन्द्र कपूर
3. चटको ना मटको ना सब नखरे हैं बेकार – .....वही.....
4. रात चांदनी जियरा डोले झूमर झूमर नाच – सुमन कल्याणपुर, महेन्द्र कपूर
5. ऐ अब बरस लग जा गले – जॉनी बाबू क़व्वाल
6. उई अम्मा मैं मर गयी हाए – (स्वर - ???)
फ़िल्म “दिलेर हसीना’ में दो क़व्वालियां होने विषयक मिली पूर्व जानकारी की पुष्टि, तमाम प्रकार से क्रॉसचेक किए जाने के बावजूद नहीं हो पाई. दुर्भाग्य से “गीतकोश” में दी गयी जानकारी भी अपूर्ण है. हमराज़ साहब के अनुसार इस फ़िल्म में गुलज़ार दीनवी के लिखे चार गीत थे. उधर नक़्श साहब के अनुसार ग़ाज़ी क़व्वालियां लिखते थे. इसका अर्थ यही हुआ कि गीत सं.5, जो शायद गीत नहीं क़व्वाली है क्योंकि इसे जॉनी बाबू क़व्वाल ने गाया है, ग़ाज़ी द्वारा लिखी गयी है. यहां सबसे बड़ा प्रश्न है कि बाक़ी 5 गीतों में से गुलज़ार दीनवी (अर्थात गुलज़ार साहब) के लिखे 4 गीत कौन से हैं. ये भी हो सकता है कि गुलज़ार साहब ने 4 नहीं बाक़ी सभी 5 गीत लिखे हों हालांकि अल्फ़ाज़ पर नज़र डाली जाए तो गीत सं.3 (चटको ना...) के भी क़व्वाली होने की संभावना बनती है. ऐसे में गीत सं. 1,2,4 और 6 का गीतकार गुलज़ार दीनवी को माना जा सकता है किंतु बिना प्रमाण के इन्हें दस्तावेज़ का हिस्सा बनाना उचित नहीं होगा. आज केवल सुमन कल्याणपुर ही हैं जो इस विषय पर से प्रकाश डाल सकती हैं. किंतु ये जानते हुए भी कि कुछ व्यक्तिगत कारणों से अब वो बाहरी दुनिया के संपर्क में नहीं आना चाहतीं, मैंने उनसे बात करने की कोशिश की और जैसी कि आशंका थी, मैं असफल रहा. रही बात गुलज़ार साहब की, तो उनसे बात करने का कोई अर्थ इसलिए नहीं है क्योंकि अगर उन्होंने अपने गीतों को लेकर ईमानदारी बरती होती तो आज हम इस बहस में न उलझे होते, हालांकि मेरा मानना है कि आप अवश्य जानते होंगे, गुलज़ार दीनवी के लिखे फ़िल्म "दिलेर हसीना" के वो 4 गीत कौन से हैं.
अंत में मैं इतना ही कहूंगा कि एक फ़िल्म पत्रकार की तुलना में फ़िल्म इतिहासकार का कार्य कहीं अधिक गंभीर और ज़िम्मेदारी भरा होता है...उसका कार्य है प्रामाणिक तथ्यों को संजोना और तथ्यों के प्रमाण जुटाकर उन्हें दस्तावेज़ की शक़्ल देना...वो दस्तावेज़, जो आगे चलकर सिनेमा के इतिहास में रूचि रखने वालों का मार्गदर्शन करते हैं, जिनकी विश्वसनीयता के साथ किसी भी प्रकार के समझौते का अर्थ है पाठकों के साथ छल. गॉसिप्स, चटपटी खबर, और वो तथ्य जिनका कोई प्रमाण न हो, फ़िल्म पत्रकार के कार्यक्षेत्र का हिस्सा तो हो सकते हैं, फ़िल्म इतिहासकार का नहीं(जैसे आपकी ये सलाह– “बात चली है क्रेडिट्स की तो क्या आप बासी सवालों की बजाय एक फ़िल्म हिस्टोरियन के नाते उन फ़िल्मों का नाम पता कर सकते हैं जिनमें काम गुलज़ार का है पर उनका नाम नहीं गया (खासकर ह्रषि दा की कुछ फ़िल्में)”). ऐसे में फ़िल्म इतिहासकार के लिए आवश्यक है कि वो सबसे पहले हर प्रकार के मोह, ममता, प्रेम, व्यक्तिपूजा, पूर्वाग्रह, राग, द्वेष, निजी पसन्द-नापसन्द आदि का त्याग करके निष्पक्ष बने. Gulzaronline.com आपको भी एक फ़िल्म इतिहासकार की श्रेणी में खड़ा करती है अत: मेरी विनम्र सलाह यही है कि बजाय किसी व्यक्तिविशेष के निजी एजेण्डा को आगे बढ़ाने के, पाठकों के समुचित मार्गदर्शन के लिए अपने इस दस्तावेज़ की विश्वसनीयता को बनाए रखें. भूलिए मत, एक फ़िल्म इतिहासकार पाठक के प्रति प्रतिबद्ध है, न कि किसी व्यक्तिविशेष के...मैं आपको धन्यवाद भी देना चाहूंगा जो आपने मेरा ध्यान उपरोक्त दोनों फ़िल्मों की ओर दिलाया जिनसे मैं अभी तक अनभिज्ञ था. काबुलीवाला के साथ ही इन दोनों फ़िल्मों को भी मैंने अब मूल आलेख में शामिल कर लिया है.
इसके साथ ही मैं अपनी ओर से इस बहस को यहीं समाप्त करता हूं.
RSS feed for comments to this post.