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| फिल्म निर्देशक करूणेश ठाकुर की अनमोल फ़नकार के साथ विशेष मुलाक़ात...!!! |
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| Written by shishir krishna sharma |
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करूणेश ठाकुर .................साक्षात्कार, अनुसंधान और आलेख : शिशिर कृष्ण शर्मा
आज़ादी से पहले के हिंदी सिनेमा और उस दौर के स्टूडियो सिस्टम का ज़िक़्र होते ही ज़हन में जो नाम सबसे पहले उभरते हैं वो हैं मुम्बई के रणजीत, बॉम्बे टॉकीज़ और वाडिया मूवीटोन, कोल्हापुर का जयाप्रभा, पुणे का प्रभात, कोलकाता का न्यू थिएटर्स और लाहौर का पंचोली आर्ट्स। ये तमाम वो स्टूडियोज थे जो उच्चकोटि की रचनात्मकता के बल पर हिंदुस्तानी सिनेमा को समृद्ध करते हुए सिनेमा के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराने में कामयाब हुए थे। लेकिन इन बड़े नामों के बीच गाहे-बगाहे कुछ एक ऐसे स्टूडियोज़ भी अस्तित्व में आए जो ख़ुद को भले ही ज़्यादा समय तक ज़िंदा न रख पाए हों, लेकिन हिंदुस्तानी सिनेमा के इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिए उन नामों को नजरअंदाज़ कर पाना मुनासिब नहीं होगा। ऐसे ही अल्पजीवी स्टूडियोज़ में से एक था लाहौर का लीलामंदिर, जिसकी नींव ठाकुर हिम्मत सिंह ने रखी थी। ठाकुर हिम्मत सिंह उन राजपूत ठिकानेदारों और ज़मींदारों के वंशज थे जिन्हें कुछ ख़ास वजहों से उत्तर भारत (अब उत्तरप्रदेश) का अपना घरबार छोड़कर महाराजा रणजीत सिंह की शरण में जाना पड़ा था और महाराजा ने उन परिवारों को लाहौर के मोची दरवाज़े के इलाक़े में बसने की इजाज़त दी थी। लाहौर में बनने वाली साईलेंट फ़िल्मों के जाने-माने अभिनेता ठाकुर हिम्मत सिंह ने साल 1940 में बनी पंजाबी फ़िल्म ‘दुल्ला-भट्टी’ में खलनायक की भूमिका निभाई थी। इस फ़िल्म के निर्देशक रूप के.शोरी और संगीतकार पंडित गोबिंदराम थे। ‘दुल्ला-भट्टी’ को इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि जाने-माने संगीतकार ओ.पी.नैयर के जीवन की ये पहली फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में अज़ीज़ कश्मीरी के लिखे गीत ‘रब दी जनाब विचों ऐहो दिल मंगदा, अंबियां दा बाग होवे, बदला दी छांव होवे’ के कोरस में हिस्सा लेने के साथ साथ वो इस गीत में परदे पर भी नज़र आए थे।
लीलामंदिर के बैनर की पहली फ़िल्म पंजाबी में बनी ‘कमली’ थी जो साल 1946 में प्रदर्शित हुई थी। इस फ़िल्म के निर्देशक थे प्रकाश बख़्शी और संगीतकार इनायत हुसैन। मुख्य भूमिकाओं में थे अमरनाथ, किरण (शौक़त) और आशा पोसले। शौक़त और आशा संगीतकार इनायत हुसैन की बेटियां थीं। इस फ़िल्म ने अपने वक़्त में अच्छा-ख़ासा बिज़नेस किया था। ऊपर दी गई गैलरी में बुकलेट के पृष्ठ और फिल्म के कलाकारों जैसे अमरनाथ, किरण, आशा पोसले, रमेश ठाकुर, भागसिंह और शेख इक़बाल की तस्वीरें शामिल हैं। आशा पोसले अभिनेत्री होने के साथ ही एक अच्छी गायिका भी थीं और उन्होंने फिल्मों में गीत भी गाए थे। उनके और आशा भोंसले के नामों में समानता अक्सर पाठकों को ताज्जुब में डाल देती है। उल्लेखनीय है कि आशा पोसले, गायिका आशा भोंसले के प्लेबैक करियर की शुरुआत से बहुत पहले ही फ़िल्मोद्योग में क़दम रख चुकी थीं। भागसिंह और शेख इक़बाल जाने माने हास्य-कलाकार थे जिनका एक रेडियो धारावाहिक उस जमाने में बेहद मशहूर हुआ था। साल 1947 में लीलामंदिर के बैनर में हिंदी फ़िल्म बेदर्दी का निर्माण शुरू किया गया। इस फ़िल्म के निर्देशन का ज़िम्मा एक बार फिर से प्रकाश बख़्शी को सौंपा गया। ठाकुर हिम्मत सिंह के बेटे करूणेश ने मैट्रिक पास करने के बाद इस फ़िल्म में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर अपना करियर शुरू किया था। 9 सितम्बर 1929 को लाहौर में जन्मे करुणेश ठाकुर साहब की उम्र उस वक़्त महज़ 18 साल थी। अनमोलफ़नकार के साथ हाल ही में हुई मुलाक़ात के दौरान उन्होंने बताया, ‘उन दिनों देहरादून में मेरी मौसी का मक़ान बन रहा था। 3 अगस्त 1947 को हमने लाहौर में फ़िल्म बेदर्दी की शूटिंग शुरू की और आगे की शूटिंग के लिए 12 अगस्त को यूनिट के साथ देहरादून पहुंचकर हम मौसी के अधबने मक़ान में ठहरे। लेकिन तभी मुल्क़ का बंटवारा हुआ और दंगे भड़क उठे। यूनिट को दंगों से बचाने के लिए हमें देहरादून छोड़कर रातोंरात कोलकाता जाना पड़ा। बेहद परेशानियों के बीच हमने कोलकाता में फ़िल्म पूरी की लेकिन वो सेंसर में अटक गयी। हमें उसका नाम तक बदलकर ‘डॉक्टर रमेश’ रख देना पड़ा लेकिन वो लालफ़ीताशाही की ऐसी शिकार बनी कि रिलीज़ ही नहीं हो पायी’। (श्री करूणेश ठाकुर द्वारा दी गयी सूचना के विपरीत हिंदी फ़िल्म गीतकोश भाग-2 में दिए गए विवरण के अनुसार फिल्म ‘डॉक्टर रमेश’ साल 1949 में प्रदर्शित हुई थी। इस विषय में श्री हरमंदिर सिंह हमराज़ का कहना है कि हिंदी फ़िल्म गीतकोश का आधार फ़िल्म का सेंसर सर्टिफ़िकेट होता है और फ़िल्म वास्तव में प्रदर्शित हुई या नहीं, ये बात उनके लिए बेमानी है। उनके अनुसार चूंकि फ़िल्म डॉक्टर रमेश को साल 1949 में सेंसर सर्टिफ़िकेट मिल चुका था इसलिए इस फ़िल्म को ‘प्रदर्शित’ की श्रेणी में रखा गया है।) ऊपर दी गई गैलरी में इस दुर्लभ फिल्म के बुकलेट कवर, कथा सार एवं गानों के बोल दिए गए हैं । इसको देखेंगे तो आप पाएंगे कि उस ज़माने में बुकलेटों पर गायकों के नाम नहीं दिए जाते थे और बोलों के साथ "लड़का", "लड़की", "दोनों" इत्यादि लिखा जाता था। कुछ बुकलेटों में फिल्म के कलाकारों के नाम भी बोलों के साथ दिए जाते थे। इन बुकलेटों में फिल्म का कथा सार हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में दर्शकों को आकर्षित करने के लिए दिया जाता था। ऊपर दी गई गैलरी में फिल्म की मूल बुकलेट दी गई है जब इसका नाम बेदर्दी था। इस बुकलेट से ये दुर्लभ जानकारी भी मिलती है कि इस फिल्म का एक अन्य नाम 'दिवाने दो' भी था। गानों के बोल भी वही हैं जो डाँ रमेश की बुकलेट में दिए गए हैं। इस तरह के बदलावों में ये भी देखा गया है कि नए गीत फिल्म में डाल दिए या कुछ गीत हटा दिए जाते थे। उस दौर को याद करते हुए करूणेश जी कहते हैं, ‘बंटवारे की वजह से लाहौर वापसी के तमाम रास्ते बंद हो चुके थे। फ़िल्म के अटक जाने से सारा पैसा डूब गया था। फ़ाक़ाकशी की हालत में हमें मजबूरन देहरादून वापस आना पड़ा। माता-पिता के अलावा घर में एक छोटा भाई और तीन बहनें थीं। देहरादून आकर मैं दो रूपए रोज़ पर जनगणना ऑफ़िस में नौकरी करने लगा और पिताजी लखनऊ जाकर सरकार के लिए डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में बनाने लगे। लेकिन घर के माली हालात संभल ही नहीं पाए। फिर एक रोज़ महज़ दस रूपए जेब में रखकर मैंने देहरादून छोड़ा और अकेला ही मुंबई चला आया। ये साल 1952 का वाक़या है’।
मुंबई में करूणेश जी की मुलाक़ात कोलकाता के उनके एक दोस्त रोशनलाल मल्होत्रा से हुई। फौज में नौकरी कर रहे मल्होत्रा का भी मुंबई में कोई ठौर-ठिकाना नहीं था इसलिए दोनों दादर की एक लॉज में ठहरे जहां उन्हें एक रूपया रोज़ाना के क़िराए पर बिस्तर मिल गए। अपने दौर के जाने-माने चरित्र-अभिनेता रमेश ठाकुर करूणेश जी के मामा थे, जिनका दादर के बसंती म्यूज़िक हॉल के पास दो कमरों का मक़ान ख़ाली पड़ा था। कुछ दिनों बाद दादर की लॉज छोड़कर करूणेश जी और मल्होत्रा उस मक़ान में रहने लगे। करूणेश जी बताते हैं, ‘छत का इंतज़ाम हुआ तो हम बेफ़िक़्र हो गए। लेकिन अचानक एक रोज़ घर के सामने एक क़त्ल होते देखा तो हमने डरकर वो जगह छोड़ दी। उन्हीं दिनों लेखक सी.एल.काविश (चुन्नीलाल नागिया) से मुलाक़ात हुई जो पेशावर के रहने वाले थे और जिनसे हमारी लाहौर से जानपहचान थी। बंटवारे से कुछ रोज़ पहले निर्माता-निर्देशक एच.एस.रवेल उन्हें अपने साथ कोलकाता ले गए थे, जहां उन्होंने रवेल की फ़िल्म ‘झूठी कसमें’ के संवाद लिखे थे। 1948 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘झूठी कसमें’ के मुख्य कलाकार रॉबिन मजूमदार, रमोला, हीरालाल, रूपलेखा, इफ़्तेख़ार और सुंदर और संगीतकार जी.ए.चिश्ती थे। बंटवारे के वक़्त काविश कोलकाता में ही थे लेकिन उनका परिवार लाहौर से देहरादून आ गया था। उधर काविश कोलकाता से मुंबई चले आए थे। मुंबई में काविश की सिफ़ारिश पर मुझे मक्खनलाल जैन और राजेन्द्र जैन की कम्पनी ‘फ़िल्मकार’ में एप्रेंटिस की नौकरी मिल गयी| इससे पहले ‘फ़िल्मकार’ के बैनर में ‘छोटी भाभी’ (1950), दीदार(1951) और ‘घुंघरू’(1952) जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया जा चुका था’। फ़िल्मकार की जिस फ़िल्म से करूणेश जी ने मुंबई में करियर शुरू किया था वो थी ‘मान’, जो साल 1954 में प्रदर्शित हुई थी। इसके मुख्य कलाकार थे अजित, चित्रा, जागीरदार, कुमार, अचला सचदेव, दुर्गा खोटे और यशोधरा काट्जू, संगीत अनिल बिस्वास का था और निर्देशक थे डॉ.सफ़दर ‘आह’। रूक-रूक कर बनी इस फ़िल्म ने निर्माताओं को आर्थिक रूप से बहुत नुक़सान पहुंचाया था जिससे उबरने के लिए उन्होंने दिलीप कुमार और नूतन को लेकर फ़िल्म ‘शिकवा’ शुरू की। नायक-नायिका की तरह ही फिल्म के निर्देशक रमेश सहगल भी उस दौर का एक बड़ा नाम थे। लेकिन फ़िल्म ‘शिकवा’ डिब्बे में चली गयी और आर्थिक संकटों से जूझ रही कंपनी ‘फिल्मकार’ बंद हो गयी। फ़िल्म शिकवा में करूणेश जी रमेश सहगल के असिस्टेण्ट थे। उसी फ़िल्म में चंदर सहगल नाम के एक और असिस्टेंट थे जिनसे करूणेश जी की अच्छी दोस्ती हो गयी थी। ‘फ़िल्मकार’ बंद हुई तो करूणेश जी को ज्योति स्टूडियो की फ़िल्म ‘पातालपरी’ में असिस्टेंट की नौकरी मिल गयी जिसके निर्देशक एस.पी.बख़्शी थे। उधर चंदर सहगल को ‘दीप प्रदीप’ में बतौर असिस्टेंट रख लिया गया। ‘दीप प्रदीप’ अभिनेता प्रदीप कुमार और निर्माता दीप खोसला की साझेदारी वाली कंपनी थी। उसी दौरान करूणेश जी ने निर्माता देव जौली की फ़िल्म ‘कारवां’ में निर्देशक रफ़ीक़ रिज़वी को भी असिस्ट किया। फ़िल्म कारवां साल 1956 में प्रदर्शित हुई थी। करूणेश जी बताते हैं, ‘एस.पी.बख़्शी को फ़िल्मिस्तान की फ़िल्म ‘सुन तो ले हसीना’ मिली तो उन्होंने फ़िल्म पातालपरी बीच ही में छोड़ दी। ऐसे में निर्माता ने पातालपरी को पूरा करने की ज़िम्मेदारी मुझे दे दी। जयराज, शकीला, तिवारी, कुमकुम, रमेश ठाकुर और यशोधरा काट्जू की भूमिकाओं वाली फ़िल्म ‘पातालपरी’ के संगीतकार थे एस.मोहिंदर और इसमें मेरा नाम ‘सह-निर्देशक’ के तौर पर दिया गया था। ये फ़िल्म 1957 में प्रदर्शित हुई थी। उधर ‘दीप प्रदीप’ में मेरे दोस्त चंदर सहगल को फ़िल्म ‘एक शोला’ से बतौर स्वतंत्र निर्देशक ब्रेक मिला। साल 1958 में प्रदर्शित हुई ‘एक शोला’ बड़े बजट की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार, माला सिंहा, जवाहर कौल, शुभा खोटे, नज़ीर हुसैन, धूमल और टुनटुन, संगीत मदनमोहन का था और फ़िल्म के संवाद नासिर हुसैन ने लिखे थे। मैंने इस फ़िल्म में चंदर सहगल के चीफ असिस्टेंट के तौर पर काम किया था। इसके अलावा इस फ़िल्म का स्क्रीनप्ले भी चंदर सहगल, मोहन कुमार और मैंने मिलकर लिखा था। रमेश सहगल के ही असिस्टेंट मोहन कुमार ने आगे चलकर ‘आस का पंछी’, ‘अनपढ़’, ‘आई मिलन की बेला’, ‘आप की परछाईयां’, ‘आप आए बहार आई’, ‘अमीरग़रीब’, ‘आपबीती’, ‘अवतार’ और ‘अमृत’ जैसी कई हिट फ़िल्में बनाईं। ‘एक शोला’ के दौरान मुझे ‘दीप प्रदीप’ की एक शॉर्ट फ़िल्म ‘नटखट चंदू’ निर्देशित करने का मौक़ा भी मिला’। ऊपर की गैलरी में दी गयी बुकलेट फिल्म "एक शोला" की बुकलेट दी गई है। बुकलेट में फ़िल्म के कथासार और गीत के बोलों को हिन्दी और अंग्रेज़ी के अलावा उर्दू में भी देखा जा सकता है। इस बुकलेट में गायकों के नाम भी दर्ज हैं जिसकी शुरूआत चालीस के दशक के अंत में, और गायिका लता मंगेशकर की ज़िद पर हुई थी! उससे पहले बुकलेट ही नहीं, फ़िल्म के रेकॉर्ड्स तक पर गायक-गायिका का नाम देने की परंपरा नहीं थी। फ़िल्म "एक शोला" के प्रदर्शन के कुछ वक़्त बाद प्रदीप कुमार और दीप खोसला अलग हो गए। दीप खोसला ने स्वतंत्र रूप से फ़िल्म ‘बंटवारा’ बनाने का फ़ैसला किया तो इसके निर्देशन की ज़िम्मेदारी करूणेश जी को दे दी। सी.एल.काविश के उपन्यास पर बनी और साल 1961 में प्रदर्शित हुई इस सामाजिक फ़िल्म के संगीतकार एस.मदन थे। फ़िल्म बंटवारा के गीत अपने दौर में बेहद मशहूर हुए थे, जिनमें ख़ासतौर से रफ़ी-आशा का गाया दोगाना ‘ये रात ये फ़िज़ाएं, फिर आएं या न आएं, आओ शमां जला के हम आज मिल के गाएं’ आज भी अपनी ताज़गी बनाए हुए है। करूणेश जी के मुताबिक़ इस गीत की मूल पंक्ति ‘...आओ शमां बुझा के हम आज दिल जलाएं’ को सेंसर के ऐतराज़ की वजह से बदलकर फ़िल्म के परदे पर ‘...आओ शमां जला के हम आज मिल के गाएं’ करना पड़ा था, हालांकि रेकॉर्ड्स और ऑडियो सीडीज़ पर ये गीत मूल रूप में ही मौजूद है। ऊपर दी गई गैलरी में मौजूद बुकलेट फिल्म "बंटवारा" की है| उधर प्रदीप कुमार ने चंदर सहगल के निर्देशन में स्वतंत्र रूप से फ़िल्म ‘मिट्टी में सोना’ का निर्माण शुरू किया। 1960 में प्रदर्शित, और ओ.पी.नैयर द्वारा संगीतबद्ध इस फ़िल्म के नायक-नायिका थे प्रदीपकुमार और माला सिंहा। इस फ़िल्म का, आशा भोंसले का गाया गीत ‘पूछो ना हमें हम उनके लिए क्या क्या नज़राने लाए हैं...’ आज भी अपनी लोकप्रियता को बनाए हुए है। बदक़िस्मती से इस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान घटी एक दुर्घटना में निर्देशक चंदर सहगल का देहांत हो गया था। उस वक़्त उनकी उम्र महज़ 30 बरस थी। अपने क़रीबी दोस्त की मौत का ग़म करूणेश जी के दिल में आज भी है। (इससे संबंधित पूरा विवरण कृपया साथ दिए गए वीडियो में सुनिए।) करूणेश जी बताते हैं, ‘फ़िल्म बंटवारा की कामयाबी के बाद मुझे कई फ़िल्में मिलीं। इनमें निर्माता बेनी तलवार की फ़िल्म ‘आगे तेरी मर्ज़ी’ और निर्माता एम.आर.सेठ की बीनाराय-मनोजकुमार की जोड़ी की फ़िल्म के अलावा सायरा-शम्मी कपूर की जोड़ी की भी एक फ़िल्म शामिल थी। लेकिन अचानक ही एक-एक करके सभी फ़िल्में बंद होती चली गयीं। ऐसे में मैंने ख़ुद ही प्रोड्यूसर बनने का फ़ैसला करते हुए पंजाबी फ़िल्म ‘सत्त सालियां’ बनाई। ये फ़िल्म ज़बर्दस्त हिट रही। इसके बाद मैंने हिंदी फ़िल्म ‘चोर दरवाज़ा’ शुरू की लेकिन ये फ़िल्म भी चार रील बनने के बाद बंद हो गयी’।
Cover of Sat Saliyan with Rarest of Rare photos of many film personalitiesCover of Sat Saliyan with Rarest of Rare photos of many film personalities
ऊपर दी गई गैलरी में फिल्म सत्त सालियाँ की बुकलेट दी गई है, जिसमें कथासार अभिनेताओं की ज़ुबानी बहुत ही खूबसूरती से दिया गया है। पब्लिसिटी का ये एक अनूठा तरीका है जो दर्शक को फिल्म देखने के लिए लालायित उसका कौतुहूल जगा कर करता है । गौरतलब है कि इसको अंग्रेज़ी के अलावा हिन्दी लिपि में लिखी पंजाबी भाषा में दिया गया है। शायद ऐसा चंडीगढ़-हरियाणा की मार्केट (जहाँ पंजाबी फिल्में तो प्रदर्शित होती हैं लेकिन वहाँ रहने वाले लोग गुरुमुखी से वाकिफ नहीं हैं।) को ध्यान में रख कर किया गया होगा। इस बुकलेट की एक और ख़ासियत ये है कि इसमें पर्दे के पीछे रहने वाले कलाकारों जैसे कि संगीतकार एस मदन, गीतकार नक्श लयालपुरी जी, गायक-गायिकाओं, कहानीकार आदि की दुर्लभ तस्वीरें दी गई हैं। उदाहरणार्थ इस बुकलेट में गुज़रे ज़माने के जाने-माने गायक एस.बलबीर की फोटो भी मौजूद है जिसे फिल्मी तवारीख़ के चाहने वाले सालों से देखना चाह रहे थे। ऐसी ही एक दुर्लभ तस्वीर गायिका कमल बारोट की भी है। अधिकतर लोग जानते भी नहीं होंगे कि कमल बारोट और सुमन कल्याणपुर ने पंजाबी में भी गीत गाए हैं। फिल्म के लेखक मनोहर सिंह सेहराई पंजाबी साहित्य का एक महत्वपूर्ण नाम रहे हें जिन्होंने कई पंजाबी फिल्मों के गीत भी लिखे है। हम ठाकुर साहब के शुक्रगुज़ार हैं जिन्होंने सुनहरे अतीत के पन्नों के इस दुर्लभ ख़ज़ाने को न सिर्फ़ संजोए रखा बल्कि उसे हमारे साथ बाँटा भी है। साल 1968 में करूणेश जी ने सी.एल.काविश के उपन्यास पर फ़िल्म ‘आंचल के फूल’ बनाई जिसके निर्माता थे एम.आर.सेठ। सज्जन, कामिनी कौशल, जीवन, जयंत, मदन पुरी, सुंदर और उल्हास के अभिनय से सजी और परिवार नियोजन पर बनी इस फ़िल्म के संगीतकार थे वेद सेठी। फ़िल्म ‘आंचल के फूल’ को उस साल का राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। करूणेश जी कहते हैं, ‘राष्ट्रपति पुरस्कार का मिलना निश्चित तौर पर मेरे लिए गौरव की बात थी लेकिन मेरे करियर को इसका कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। जो भी बड़ी फ़िल्में मैंने शुरू की थीं वो सभी अधूरी रह गयी थीं।
मजबूरन मुझे ‘भावना’(1972), ‘बाज़ीगर’(1972), ‘अलबेली’(1974), और ‘शादी से पहले’(1980) जैसी कम बजट और छोटी स्टार कास्ट वाली फ़िल्में करनी पड़ीं, हालांकि उनके स्तर को लेकर मैंने कोई भी समझौता नहीं किया’। ऊपर दी गई गैलरी में फिल्म भावना की बुकलेट दी गई है। जानकार श्रोता जानते होंगे कि इस फिल्म के संगीतकार जयदेव थे एवं गीतकार नक्श लयालपुरी थे। इस बुकलेट में हरेक गीत के साथ गायक का नाम भी मौजूद है। ‘पातालपरी’ और ‘एक शोला’ के अलावा करूणेश जी ने ‘मैं और मेरा भाई’(1961), ‘दलाल नं. वन’(2000) और पंजाबी की ‘सत गुरू तेरी ओट’, ‘नदियों विछड़े नीर’, ‘खालसा मेरो रूप है ख़ास’ जैसी फ़िल्में भी लिखीं। और फिर बढ़ती उम्र की वजह से शोबिज़ से अलग होकर साल 2000 में वो वापस देहरादून चले गए।
करूणेश ठाकुर साहब अब देहरादून के करनपुर स्थित पुश्तैनी मक़ान में अपने छोटे भाई और बहन के साथ रहते हैं। उनकी पत्नी और दो बहनों का देहांत हो चुका है। उनके भाई व्यवसायी हैं, छोटी बहन सुश्री कमलेश ठाकुर देहरादून के मशहूर मार्शल स्कूल में हिंदी शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं और शादीशुदा बेटी रोहिणी पति के साथ मुंबई में रहती है। करूणेश जी फ़िलहाल ‘उत्तराखण्ड फ़िल्म चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स’ के वाईस प्रेसिडेंट पद पर कार्यरत हैं। साल 1999 में उन्हें उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री सूरजभान द्वारा नागरिक परिषद के ‘के.एन.सिंह फ़िल्म विद्या दून रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।
दिनांक 14 दिसम्बर 2011 की शाम देहरादून स्थित निवासस्थान पर हुई इस बातचीत के अंत में करूणेश जी कहते हैं, ‘कभी कभी सोचता हूं, अगर मेरी फ़िल्में अधूरी न रह गयी होतीं तो शायद करियर की दिशा कुछ और ही होती। लेकिन फिर लगता है, सिवा ‘कर्म’ के, इंसान के बस में और कुछ है भी तो नहीं’। ......................................................................................................... आभार : हम देहरादून के जाने माने रंगकर्मी और 'अभिरंग' नाट्य संस्था के संस्थापक श्री अतीक़ अहमद के तहेदिल से शुक्रगुज़ार हैं जिनके प्रयासों से ये साक्षात्कार सम्भव हो पाया। वीडियो एडिटिंग के लिए हम सदैव श्री मनस्वी शर्मा के आभारी रहेंगे। |
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