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Omi (Sonik) in An Exclusive Interview With Anmol Fankaar PDF Print E-mail
Written by shishir krishna sharma   

(सोनिक) ओमी.............................. 

                                                      इण्टरव्यू और आलेख : शिशिर कृष्ण शर्मा

 

Omi ji remembering Sonik
     प्रभात फ़िल्म्स (पुणे) की साल 1944 में बनी फ़िल्म ‘चांद’ से हिंदी सिनेमा की पहली संगीतकार जोड़ी ‘हुस्नलाल भगतराम’ ने करियर की शुरूआत की थी। उसके बाद साल 1946 में बनी फ़िल्म ‘रूक्मिणी स्वयंवर’ से एक और संगीतकार जोड़ी ‘वासुदेव-सुधीर’ अस्तित्व में आयी लेकिन ये इस जोड़ी की पहली और आख़िरी फ़िल्म साबित हुई। आगे चलकर वासुदेव ने स्नेहल भाटकर, तो सुधीर ने सुधीर फड़के के नाम से पहचान बनाई। 1949 में राजकपूर की फ़िल्म ‘बरसात’ से ‘शंकर-जयकिशन’ के आगमन के साथ ही संगीतकार जोड़ियों का प्रचलन आम होता चला गया। ‘शर्माजी-वर्माजी’, ‘रवि-चन्द्रा’, ‘कल्याणजी-आनंदजी’, ‘लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल’, ‘सपन-जगमोहन’ से होता हुआ संगीतकार जोड़ियों का ये सफर ‘उत्तम-जगदीश’’, ‘शिव-हरि’, ‘नदीम-श्रवण’, ‘दिलीप सेन-समीर सेन’, ‘आनंद-मिलिंद’, ‘जतिन-ललित’ से लेकर आज ‘विशाल-शेखर’, ‘सलीम-सुलेमान’, ‘साजिद-वाजिद’ तक बदस्तूर जारी है। ऐसी ही एक जोड़ी ने 60 के दशक में हिन्दी फ़िल्मोद्योग में धमाकेदार एण्ट्री की थी। वो संगीतकार जोड़ी थी ‘सोनिक-ओमी’ की और फ़िल्म थी, साल 1966 में रिलीज़ हुई ‘दिल ने फिर याद किया’। ‘रावल फ़िल्म्स’ के बैनर में बनी इस फ़िल्म के निर्देशक थे सी.एल.रावल और मुख्य कलाकार, नूतन, धर्मेन्द्र और रहमान। जी.एल.रावल के लिखे और सोनिक-ओमी द्वारा संगीतबद्ध किए इस फ़िल्म के दसों गीत आज 45 साल बाद भी उतने ही लोकप्रिय हैं। क़रीब ढाई दशक के अपने करियर के दौरान सोनिक-ओमी ने क़रीब सौ फ़िल्मों में संगीत दिया। और फिर साल 1993 में सोनिक के देहांत के बाद ये जोड़ी हिन्दी सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बनकर रह गयी। इस जोड़ी के ओमी जी आज भी चुस्त-दुरूस्त हैं और अंधेरी पश्चिम के यारी रोड इलाक़े में अपने बेटे –बहू के साथ रहते हैं। हाल ही में अनमोल फ़नकार के साथ हुई मुलाक़ात के दौरान ओमी जी ने अपनी निजी और व्यवसायिक ज़िंदगी के बारे में विस्तृत बातचीत की।
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     13 जनवरी 1939 को स्यालकोट (पाकिस्तान) में जन्मे ‘ओमप्रकाश सोनिक’ के पिता का ज़मीनें खरीदने-बेचने का कारोबार था और मां एक आम घरेलू महिला थीं। आठ भाई और दो बहनों में ओमप्रकाश तीसरे नम्बर पर थे। उन्होंने चौथी तक की पढ़ाई स्यालकोट में की थी। उन्हीं दिनों बंटवारा हुआ तो उनका परिवार पठानकोट, अमृतसर और यमुनानगर में रूकता-ठहरता आख़िर में दिल्ली आकर बस गया। ओमप्रकाश के सगे चाचा ‘मनोहरलाल सोनिक’ अभिनेता ओमप्रकाश के बड़े भाई बक्षी जंगबहादुर की ‘म्यूज़िकल डांस पार्टी’ में बतौर गायक नौकरी करते थे और बंटवारे के समय कार्यक्रम के सिलसिले में देहरादून गए हुए थे। मनोहरलाल जब दो बरस के थे तो उनकी आंखें चली गयी थीं। लाहौर के ब्लाईंड स्कूल से ब्रेल में मैट्रिक करने के बाद उन्होंने संगीत में विशारद किया था। उन्होंने कुछ समय बतौर सहायक, पंडित अमरनाथ के साथ काम किया, और फिर उन्हें ‘म्यूज़िकल डांस पार्टी’ में नौकरी मिल गयी थी। ओमी जी बताते हैं, ‘हमारे दिल्ली पहुंचने के साथ ही चाचा मनोहरलाल भी देहरादून से दिल्ली आ गए, जहां उन्हें ‘माणिकलाल’ थिएटर ग्रुप में नौकरी मिल गयी। चाचा मुझसे क़रीब 17 साल बड़े थे। गाने का मुझे भी बहुत शौक़ था इसलिए मैं चाचा के काफ़ी क़रीब था। चूंकि वो आंखों से लाचार थे, इसलिए जब उन्होंने मुम्बई जाकर फ़िल्मों में क़िस्मत आजमाने का फ़ैसला किया तो उन्हें सहारा देने के लिए पिताजी ने मुझे भी उनके साथ भेज दिया। और इस तरह साल 1948 में हम दोनों मुम्बई चले आए।‘
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     मुम्बई में मनोहरलाल सोनिक की पहचान के सिर्फ़ दो ही लोग थे, जिनमें एक थे पंडित अमरनाथ के संगीतकार बेटे हरबंस और दूसरी गायिका शांति शर्मा, जिन्होंने लाहौर में मनोहरलाल सोनिक से गायन की शिक्षा ली थी। 40 के दशक के आख़िर में शांति शर्मा ने रईस, धूमधाम, शौक़ीन, वीर घटोत्कच और आहुति जैसी कुछ फ़िल्मों में गीत गाए थे और फिर वो मुम्बई छोड़कर दिल्ली जा बसी थीं।

 

(यदि किसी पाठक के पास गायिका शांति शर्मा के विषय में किसी भी प्रकार की जानकारी हो तो कृपया अनमोल फ़नकार को अवश्य सूचित करें, धन्यवाद !)

 

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     मुम्बई पहुंचकर मनोहरलाल और ओमी जी शांति शर्मा से उनके खार (पूर्व) स्थित निवासस्थान पर जाकर मिले और उसी दिन शांति शर्मा के साथ उन्हें रेकॉर्डिंग पर जाने का मौक़ा मिला। ओमीजी बताते हैं, ‘मेरी उम्र उस वक़्त महज़ नौ बरस की थी इसलिए ये तो मुझे याद नहीं है कि वो फ़िल्म या गीत कौन सा था लेकिन वो एक युगलगीत था और चूंकि रेकॉर्डिंग पर पुरूष गायक नहीं पहुंच पाया था इसलिए संगीतकार हरबंस ने वो गीत शांति शर्मा और चाचा की आवाज़ों में रेकॉर्ड कर लिया था।‘ ये एक अच्छी शुरूआत थी जिसके बाद मनोहरलाल ने मास्टर सोनिक के नाम से हुस्नलाल भगतराम और गुलशन सूफ़ी जैसे संगीतकारों के लिए कई गीत गाए। साल 1955 में बनी फ़िल्म ‘घमंड’ में गुलशन सूफ़ी के संगीत में उनका गाया सोलो गीत ‘सुबह का भूला शाम को गर लौट के घर आ जाए’ उस दौर में बेहद मशहूर हुआ था।
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     मुम्बई में ओमी जी के एक मामा सरदार मानसिंह राणा भी रहते थे जो आज़ाद हिंद फ़ौज से अपने जुड़ाव की  वजह से कॉमरेड कहलाते थे। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के निधन के बाद वो मुम्बई चले आए थे, जहां उन्होंने कॉमरेड प्रताप राणा के नाम से निर्माता हल्दिया के साथ मिलकर फ़िल्म ‘परवाना’ बनाई थी। साल 1947 में रिलीज़ हुई फ़िल्म परवाना के.एल.सहगल की आख़िरी फ़िल्म थी। उसके बाद कॉमरेड प्रताप राणा ने अकेले ही फ़िल्म ‘विद्या’ (1948) और ‘जीत’ (1949) बनाईं। जीत उनकी पहली पत्नी का नाम था जिनके गुज़र जाने के बाद उन्होंने निर्देशक मोहन सिंहा की बेटी विद्या के साथ दूसरा विवाह किया था। लेकिन साल 1947 में प्रसव के दौरान विद्या का भी देहांत हो गया था। कॉमरेड प्रताप राणा ने अपनी फ़िल्मों के नाम श्रद्धांजलि स्वरूप अपनी दोनों स्वर्गवासी पत्नियों के नामों पर रखे थे। विद्या की नवजात बच्ची को उसके नाना मोहन सिंहा ने पाला- पोसा और उसका नाम भी अपनी स्वर्गवासी बेटी के नाम पर ही रखा। ओमी जी की उस ममेरी बहन को आज हम अभिनेत्री विद्या सिंहा के तौर पर जानते हैं। 
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     उधर निर्माता हल्दिया ने ‘परवाना’ के बाद अकेले ही फ़िल्म ‘ईश्वरभक्ति’ (1951) और ‘ममता’ (1952) बनाईं। इन दोनों ही फ़िल्मों के संगीत की ज़िम्मेदारी उन्होंने मनोहरलाल सोनिक को दी। ‘ईश्वरभक्ति’ में मनोहरलाल ने अपने मैनेजर गिरधर के साथ जोड़ी बनाकर ‘सोनिक-गिरधर’ के नाम से संगीत दिया था। फ़िल्म ‘ममता’ का संगीत उन्होंने अकेले ‘सोनिक’ के नाम से तैयार किया था, हालांकि उस फ़िल्म के कुल आठ गीतों में से एक गीत की धुन हंसराज बहल ने बनाई थी। लेकिन न तो ‘ईश्वरभक्ति’ चली और न ही ‘ममता’ कोई छाप छोड़ पायी। उधर संगीतकार बन जाने पर सोनिक को बतौर गायक काम मिलना भी करीब क़रीब बंद ही हो गया जिसकी वजह से संघर्ष का दौर फिर से शुरू हो गया। ओमी जी बताते हैं, ‘चाचा ने उस मुश्क़िल वक़्त का इस्तेमाल वी.बलसारा से फ़िल्म संगीत की बारीकियां सीखने में किया, हॉरमोनियम बजाने में महारत हासिल की, और बहुत जल्द वो बतौर हॉरमोनियम वादक बेहद व्यस्त हो गए। ऐसी ही एक रेकॉर्डिंग के दौरान संगीतकार मदनमोहन ने उनसे अरेंजर का काम लिया तो इस नयी भूमिका में भी वो खरे साबित हुए। दरअसल उस फ़िल्म के लिए मदनमोहन को भारतीयता की छाप लिए हुए गीत-संगीत बनाना था जबकि उनके अरेंजर ‘चिक चॉकलेट’ जो अफ़्रीकी मूल के एक ट्रम्पेट वादक थे, सिर्फ़ पाश्चात्य संगीत के जानकार थे।‘
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     मदनमोहन के बाद मनोहरलाल सोनिक संगीतकार रोशन के अरेंजर बने। इसके अलावा उन्होंने उषा खन्ना की पहली फ़िल्म ‘दिल देके देखो’ में भी बतौर अरेंजर काम किया। उधर ओमीजी के गाने का शौक़ भी रोशन की फ़िल्म ‘बाबर’ में पूरा हुआ जब उन्हें इस फ़िल्म में कोरस में गाने का मौक़ा मिला। और जब इसी फ़िल्म के  रफ़ी के गाए मशहूर गीत ‘तुम एक बार मोहब्बत का इम्तहान तो लो’ की रेकॉर्डिंग के दौरान संगीतकार रोशन के असिस्टेंट ‘मारिया’ नहीं पहुंच पाए तो उसके लिए भी रोशन ने ओमी जी की मदद ली जो हमेशा ही अपने नेत्रहीन चाचा का सहारा बनकर उनके साथ मौजूद होते थे। उस रेकॉर्डिंग के दौरान ओमी जी की मेहनत और लगन को देखकर रोशन इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ओमी जी को भी स्थायी तौर पर अपना असिस्टेंट बना लिया। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में मुम्बई पुलिस के मशहूर उच्चाधिकारी राकेश मारिया, रोशन के उन्हीं असिस्टेण्ट ‘मारिया’ के बेटे हैं।
      ओमी जी बताते हैं, ‘हम लोग लगातार रोशन साहब के साथ काम करते रहे और उस दौरान मैंने चाचा के अलावा रोशन साहब से भी संगीत की तमाम बारीकियां सीखीं। रोशन की, साल 1963 में बनी राज कपूर और नूतन अभिनीत फ़िल्म ‘दिल ही तो है’ में पहली बार मेरे नाम को चाचा के साथ जोड़कर हमें बतौर अरेंजर ‘सोनिक-ओमी’ के नाम से पेश किया गया था। इस नाम को देखकर उस फ़िल्म के निर्माता जी.एल.रावल के मुंह से बेसाख़्ता निकल पड़ा था कि ये नाम तो किसी संगीतकार जोड़ी का सा लगता है, और बहुत जल्द उन्हीं ने हमें फ़िल्म ‘दिल ने फिर याद किया’ के संगीत की ज़िम्मेदारी देकर अपनी कही बात को हक़ीक़त में तब्दील कर दिया।‘
     ‘दिल ने फिर याद किया’ अपने दौर की बहुत बड़ी म्यूज़िकल हिट साबित हुई। लेकिन उसके बाद दो साल तक ‘सोनिक-ओमी’ की इस जोड़ी को अच्छे ऑफ़र के इंतज़ार में ख़ाली बैठे रहना पड़ा। उस दौरान छोटी-छोटी फ़िल्मों के ऑफ़र्स तो उन्हें मिलते रहे लेकिन ऐसे तमाम ऑफ़र्स को वो ठुकराते चले गए। उधर संगीतकार बन जाने की वजह से असिस्टेण्ट और अरेंजर का काम मिलना भी बंद हो गया था। ओमी जी बताते हैं, ‘इतनी बड़ी हिट देने के बावजूद संघर्ष का दौर एक बार फिर से शुरू हो चुका था। हम आख़िर कब तक साईनिंग अमाऊंट पर निर्भर रह सकते थे। नतीजतन एक वक़्त ऐसा आया जब हमें जो भी काम मिला उसे मंज़ूर करना ही पड़ा। साल 1968 में रिलीज़ हुई हमारी दूसरी फ़िल्म ‘आबरू’ का संगीत भी बेहद लोकप्रिय हुआ था। कामयाबी का कुछ ऐसा ही रेकॉर्ड साल 1969 में रिलीज़ हुई ‘महुआ’ और 1970 की ‘सावन भादों’ के संगीत ने भी बनाया था। लेकिन फ़ाकाकशी के दौरान साईन की हुई छोटी-छोटी फ़िल्मों की रिलीज़ ने हमारे करियर पर बुरा असर डाला और हमें बी ग्रेड की फ़िल्मों का संगीतकार माना जाने लगा। हालांकि उस दौरान भी जब कभी हमें मौक़ा मिला, हमने फिर से अपने शुरूआती स्तर पर पहुंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी, चाहे वो फ़िल्म ‘धर्मा’ हो या ‘रफ़्तार’ या ‘उमर क़ैद’। यहां तक कि गाहे-बगाहे निर्माता-निर्देशक-अभिनेता जोगिंदर की ‘बिंदिया और बंदूक’, ‘दो चट्टानें’ और ‘फ़ौजी’ जैसी फ़िल्मों के गीत भी हिट होते रहे। लेकिन फ़्रीलांसिंग की अपनी मजबूरियां हैं जिनकी वजह से हमारे करियर पर 'बी' ग्रेड का ठप्पा क्या लगा कि फिर कभी वो मिट ही नहीं पाया।‘
     फ़िल्म ‘महुआ’ के एक गीत में ओमी जी ने आशा भोंसले का साथ देकर अपने गायन के शौक़ को फिर से ज़िंदा किया था। लेकिन इस शौक़ को उन्होंने गंभीरता से कभी नहीं लिया। ‘एक खिलाड़ी बावन पत्ते’ ‘मेहमिल’ ‘धर्मा’, ‘शाही लुटेरा’, ‘यारी ज़िंदाबाद’, ‘वीरू उस्ताद’, अपना खून’, ‘भक्ति में शक्ति’, ‘रामकसम’, ‘तीन इक्के’, ज़ुल्म की पुकार’, ‘बदला और बलिदान’, ज्वाला डाकू’, ‘खून की टक्कर’, ‘रामकली’, सीतापुर की गीता’, ‘तेरा करम मेरा धरम’ और देश के दुश्मन’ जैसी तीस फ़िल्मों में ओमी जी ने चालीस के क़रीब गीत गाए इसके बावजूद उनकी पहचान संगीतकार की ही बनी रही। मीनाकुमारी की मौत के कुछ समय बाद एच.एम.वी. कम्पनी ने ओमी जी की आवाज़ में दो ग़ज़लों का एक प्राईवेट अलबम भी बाज़ार में उतारा था। मीनाकुमारी को श्रद्धांजलि स्वरूप ये दोनों ग़ज़लें उनकी आवाज़ के रूप में पहचान बना चुकीं डबिंग कलाकारा साधना खोटे ने लिखी थीं। 
     यों तो साल 1989 में रिलीज़ हुई ‘देश के दुश्मन’ ‘सोनिक-ओमी’ द्वारा संगीतबद्ध की गयी आख़िरी फ़िल्म थी, लेकिन पहले से बनती आ रही उनकी कुछ छोटी-छोटी फ़िल्में बाद तक भी रिलीज़ होती रहीं। साल 1998 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘हिंद की बेटी’ को उनकी आख़िरी रिलीज़ कहा जा सकता है।
     क़रीब एक साल पहले यूनिवर्सल कम्पनी ने ‘अनहर्ड मॅलोडीज़’ के नाम से एक ऑडियो सी.डी. रिलीज़ की थी, जिसमें सोनिक-ओमी के 14 बेहद कर्णप्रिय ऐसे गीतों को शामिल किया गया है जो किसी वजह से अभी तक बाज़ार में नहीं आ पाए थे।
     फ़िल्म ‘नया दौर’ के गीत ‘ये देश है वीर जवानों का’ में रफ़ी के सहगायक एस.बलबीर ओमीजी के बेहद क़रीबी दोस्तों में से थे। बलबीर ने ‘आज क्यों हमसे परदा है’ (साधना), ‘भेज छना छन’ (अब दिल्ली दूर नहीं), ‘चाहे ये मानो चाहे वो मानो’ (धर्मपुत्र), ‘ये माना मेरी जां, मोहब्बत सज़ा है’ (हंसते ज़ख़्म), ‘जी चाहता है चूम लूं’ (बरसात की रात), ‘जो मामा आ जाएगा’ (हीर रांझा) जैसे कई हिट गीत गाए थे। सत्तर के दशक की शुरूआत तक तो उनके इक्का-दुक्का गीत बाज़ार में आते रहे लेकिन फिर लोगों के ज़हन से बलबीर का नाम मिटता चला गया। अनमोल फ़नकार के साथ बातचीत के दौरान एस.बलबीर के अचानक ही ग़ायब हो जाने की वजह पर से परदा हटाते हुए ओमी जी ने बताया कि बलबीर ने शादी नहीं की थी और वो अंधेरी (पश्चिम) के यारी रोड-वर्सोवा की कोली बस्ती में एक कोली महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहते थे। सन 1970 के आसपास पंजाब के उनके गांव में उन्हें क़त्ल कर दिया गया था। उस वक़्त उनकी उम्र क़रीब 40 साल थी।
(इससे संबंधित पूरा विवरण ओमी जी की ज़ुबानी साथ दिए गए वीडियो में सुनें।)

 

Video edited by: Master Manaswi Sharma 

     मनोहरलाल सोनिक का जन्म 24 नवम्बर 1923 को गुजरांवाला में हुआ था। 9 जुलाई 1993 को उनका देहांत हुआ जिसके बाद ये जोड़ी हिन्दी सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बनकर रह गयी। अब पिछले कई बरसों से ओमी जी ‘इंडियन परफ़ॉर्मिंग राईट्स सोसायटी’ (आई.पी.आर.एस.) के निदेशक पद पर कार्यरत हैं। आई.पी.आर.एस. वो संस्था है जो गीत की रॉयल्टी को लेकर गीतकारों, संगीतकारों, निर्माताओं और म्यूज़िक कंपनियों के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए इन सभी के हित में काम करती है।
     एक बेटे और एक बेटी के पिता ओमी जी यानि कि ओमप्रकाश सोनिक अपने बेटे सोम सोनिक, बहू और दो पोतों निखिल और करण के साथ रहते हैं। उनकी बेटी का विवाह हो चुका है और वो मुम्बई के ही पवई इलाक़े में अपने होटल व्यवसायी पति के साथ रहती हैं। ओमी जी कहते हैं, ये तो फ़िल्मी दुनिया का दस्तूर ही है कि जो ऊपर चढ़ा, उसे एक रोज़ नीचे भी गिरना ही होता है। जिसने फ़िल्मी दुनिया की इस सच्चाई को समझ लिया, उसे हालात से समझौता करने में कभी भी परेशानी नहीं होती। ख़ुशकिस्मती से मैं भी ऐसे ही लोगों में से हूं।

सोनिक-ओमी’ द्वारा संगीतबद्ध कुछ मशहूर गीत (वीडियो) :

1. दिल ने फिर याद किया बर्क़ सी लहर आयी है
 
2. मैं सूरज हूं तू मेरी किरण
 
3. कलियों ने घूंघट खोले
 
4. ये दिल है मोहब्बत का प्यासा
 
5. जिन्हें हम भूलना चाहें
 
6. आप से प्यार हुआ आप ख़फ़ा हो बैठे
 
7. हर चेहरा यहां चांद
 
8. दोनों ने किया था प्यार मगर
 
9. मैं हूं तेरा गीत गोरी
 
10. जब जब अपना मेल हुआ
 
11. कान में झुमका चाल में ठुमका
 
12. सुन सुन सुन ओ ग़ुलाबी कली
 
13. संसार है इक नदिया
 
14. याद रहेगा प्यार का ये
 
15. राज़ की बात कह दूं तो
 

 

‘सोनिक-ओमी’ द्वारा संगीतबद्ध कुछ फ़िल्में (ऑडियो) :

अलबम ‘अनहर्ड मॅलोडीज़’ सोनिक ओमी :

ओमी जी के गाए गीत :

 

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Comments  

 
+1 # 2011-11-23 06:38
Many thanx for sharing valuable information regarding Omiji. Some of the facts of this pair were really unknown. Also the fact regarding Balbir is very tragic and perhaps unknown.
 

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