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| गीतों में गड़बड़ियाँ |
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| Written by shishir krishna sharma |
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सन 1955 में बनी कारदार प्रोडक्शन्स की फिल्म 'बाप रे बाप' का किशोर कुमार और आशा भोंसले का गाया एक मशहूर दोगाना था "पिया पिया पिया मोरा जिया पुकारे' जिसके गीतकार थे जाँनिसार अख्तर और संगीतकार ओपी नय्यर. रेकार्डिंग के दौरान इस गीत के दूसरे अंतरे में किशोर कुमार को अपनी पंक्तियाँ, 'ये रुत मनभाती ये दिन मदमाते...' दोहरानी थीं जिसके बाद आलाप के साथ आशा की पंक्तियाँ थीं, 'मेरे पिया झूमे जिया...' किन्तु गलती से आशा ने किशोर कुमार के पंक्तियाँ दोहराने से पहले ही आलाप ले लिया। किशोर कुमार ने उन्हें आगे गाते रहने का इशारा किया। चूँकि फिल्म के नायक वही थे इसलिए परदे पर इस आलाप के समय नायिका चाँद उस्मानी के मुँह पर हाथ रखकर उन्होंने इस गलती को अभिनय का ही हिस्सा बना लिया । इण्टरव्यू और कार्यक्रमों के दौरान किशोर कुमार और आशा अक्सर इस बात का ज़िक्र करते आए हैं । एच एम वी के टेप कलेक्शन 'द एवर वर्सटाइल आशा भोंसले' के चौथे और आखिरी टेप पर भी आशा ने इसका ज़िक्र किया है।
इसी तरह की गलती फिल्म भंवरा के बेहतरीन दोगाने "क्या हमने बिगाड़ा है" के आखिर में सहगल साहब द्वारा भी की गई थी। इसमें गायिका अमीरबाई कर्नाटकी की लाइन "तुम हमें अपना बनाते हो" के दूसरी बार गाने के समय सहगल अपनी लाइन "क्या हमने बिगाड़ा है" का "क्या" गाते गाते रुक जाते हैं और अमीरबाई के पंक्ति खत्म करने के बाद उसे सही जगह पर गाते हैं।
दरअसल लिखे जाने, धुन में ढलने, रेकॉर्ड होने फिल्माए जाने और रेकॉर्ड, कैसेट या सीडी के ज़रिए बाज़ार में आने तक गीत इतने चरणों से गुज़र चुका होता है कि चूक का रह जाना लगभग असम्भव ही होता है । इसके बावजूद ऐसे भी गीत हैं जो कई दशकों से देखे-सुने जाते रहे हैं किन्तु उनमें रह गई गलतियों की ओर शायद किसी ने ध्यान ही नहीं दिया । ऐसा ही एक मशहूर गीत है फिल्मालय की शशधर मुखर्जी द्वारा निर्मित, राज खोसला द्वारा निर्देशित और ओ पी नय्यर द्वारा संगीतबद्ध फिल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना' का रफी और आशा का गाया 'मैं प्यार का राही हूँ...' जिसे लिखा था 'राजा मेहन्दी अली खान' ने । इस गीत के पहले अन्तरे में रफी की पंक्तियाँ हैं, 'तेरे बिन जी लगे ना अकेले... नाज़नीं तू नहीं जा सकेगी छोड़कर ज़िन्दगी के झमेले', जिसके जवाब में आशा गाती हैं, 'जब भी छाए घटा याद करना ज़रा सात रंगों की हूँ मैं कहानी...' वहीं दूसरे अन्तरे में रफी गाते हैं, 'प्यार की बिजलियाँ मुस्कुराएँ ... दिल कहे देखता ही रहूँ मैं सामने बैठकर ये अदाएँ', जिसके जवाब में आशा की पंक्तियाँ हैं, 'ना मैं हूँ नाज़नीं ना मैं हूँ महजबीं..' । शब्द, भाव और अर्थ पर जाएं तो स्पष्ट है कि दोनों अन्तरों में आशा की पंक्तियाँ आपस में बदल गई हैं । निश्चय ही लेखन के स्तर पर ऐसी भूल सम्भव नहीं है । फिर इतनी गम्भीर चूक हुई कहाँ ? शायद यह बात हमेशा ही एक रहस्य बनी रहे ।
सन 1978 में प्रदर्शित, संगीतकार ओ.पी. नय्यर की ही एक अन्य फिल्म 'हीरा मोती' में दिलराज कौर के गाए गीत 'सौ साल जियो तुम जान मेरी' को अगर ध्यान से सुना जाए तो पहले और दूसरे अन्तरे की पंक्तियाँ क्रमश: 'मेरी जान तुम्हारी बाँहों मे...' और 'मेरी माँग सुहागन कहलाए...' भी स्पष्टतया आपस में बदली हुई प्रतीत होती हैं । 1976 में बनी फिल्म चाँदी सोना के गीत "उलझन हज़ार कोई डाले" में मन्ना डे साहब ने एक पंक्ति में एक शब्द "बाँहों" को "हाथों" में बदल दिया, जिसके नजीतन पंक्ति बन गई "जैसे बहार खड़ी लिए हाथों के हार"। उर्दू शायरी में "हाथों के हार" की कोई जगह तो नहीं है। प्रतीत होता है कि रिकार्डिंग के समय मजरूह साहब मौजूद नहीं होंगे जिसके चलते ये त्रुटि गाने में रह गई। गीत में चूक का एक अन्य उदाहरण है बासु चटर्जी द्वारा सन 1974 में निर्मित-निर्देशित फिल्म 'उस पार' का लता का गाया गीत 'ये जब से हुई जिया की चोरी...' जिसे लिखा था योगेश ने और संगीतकार थे सचिन देव बर्मन । इस गीत में गायिका की भूल से निर्माता-निर्देशक और गीतकार अनभिज्ञ थे, और ध्यान दिलाए जाने पर उन्हें बेहद अचम्भा हुआ । दरअसल लता ने पूरा गीत बेहद खूबसूरती से गाया , किन्तु अन्तिम पँक्ति में उनके मुँह से 'जिया की चोरी' के स्थान पर निकल पडा, 'जिया की छोरी', और तब से यह गाना इसी रूप में बदस्तूर बजता आ रहा है। कई बार गायकों ने उच्चारण में भी गलतियाँ की हैं जो गाने में रिकार्डिंग के बाद भी रह गईं। फिल्म धर्मपुत्र के गीत "मैं जब अकेली होती हूँ" की दूसरी पंक्ति "हालात के तपते तूफान में जज़्बात की कश्ती खेती हूँ" के दूसरे अंतरे की दूसरी पंक्ति में आशा ने खेती शब्द का उच्चारण सही नहीं किया है। उन्होंने उसमें नुक्ता लगा दिया है। फिल्म यहूदी के गीत "बोल मेरे मालिक" में लता ने यूँही मालिक की जगह मलीक गाया है। फिल्म सगाई (1951) के गीत "झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए" की पंक्ति "श्रीमती हो या बेगम एक जान और सौ सौ ग़म" में लता ने "बेगम" शब्द ग को उर्दू गाफ की जगह ग़ैन का उपयोग कर बेगम को बेग़म गाया है। यहाँ वैसे मैं बता दूँ कि कुछ गानों में संगीतकारों की मूल भाषा का कई बार गानों के उच्चारण का प्रभाव देखा गया है जिसके चलते शब्द का उर्दू में उच्चारण अलग है पर संगीतकार ने स्पष्ट तौर पर शब्द का उच्चारण अपनी भाषा की तरह करवाया है क्योंकि उनके हिसाब से वह स्टाइल गाने की लय को बेहतर सूट करता है (मतलब ऐसा जान बूझ कर किया जाता था जिसे गलती नहीं कहा जा सकता)। 1949 की फिल्म लेख के एक गाने में यह देखा जा सकता है। संगीतकार हंसराज बहल और गीतकार कमर जलालाबादी दोनों पंजाबी मूल के थे। उसमें गीता जी के गाया गाना है "तू मुस्करा तेरे लब पर हँसी रहे न रहे", जिसके दूसरे शब्द को उर्दू स्टाइल में "मुस्कुरा" की जगह पंजाबी स्टाइल में गीता जी "मुस्करा" गाती हैं! फिल्म सावन की घटा के गीत "आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया" की पंक्तियों जैसे "मैं तो आगे बढ़ गई पीछे ज़माना रह गया" में शब्द "रह" को लय के हिसाब से हिन्दी/उर्दू स्टाइल में कभी "रह" गाया गया है और कभी पंजाबी स्टाइल में "रै" गाया गया है! 1945 की फिल्म ज़ीनत में नूरजहाँ जी को गीत आँधियाँ गम की यूँ चली में भी पंजाबी स्टाइल में उर्दू "रह" की जगह "रै" गाते सुना जा सकता है। हिन्दी फिल्मों में भोजपुरी उच्चारण भी इसी तरह से गीतों मे सुना जा सकता है जहाँ गाने या फिल्म की पृष्ठभूमि की माँग को ध्यान में रखा गया है (जैसे कि फिल्म गंगा जमुना में)। पर कभी-2 गलती से भी गानों में दूसरी भाषाओं का उच्चारण देखा गया है। जैसे, फिल्म अन्दाज़ के गीत "मेरी लाडली री मेरी लाडली" कि पंक्ति "गुड़िया नाचे" में लता जी को मराठी स्टाइल में "नाचे" को कहते सुना जा सकता है जो थोड़ा अटपटा लगता है क्योंकि वो गीत के हिसाब से नहीं है। वैसे कई अंग्रेज़ी शब्दों को भी अक्सर गीतों की धुन के विपरीत गाया गया है। अन्त में हम यही कह सकते हैं कि गाने की सुन्दरता पर इस तरह की गलतियों का जब तक असर न रहे हम श्रोताओं को कोई शिकायत नहीं है। नोट: शिशिर कृष्ण शर्मा जी के लिखे मूल लेख में हमाराफोरम और आर.एम.आई.एम. की कुछ चर्चाओं से कुछ उदाहरण अडमिन द्वारा शामिल किए गए हैं । इन उदाहरण देने वाले श्रोताओं जैसे महेश शर्मा जी, अभय फडनिस , विजय कुमार, आसिफ, आदित्य , मालिनी जी इत्यादि के हम आभारी हैं।
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Comments
इतनी बारीक जानकारियां देने के लिये शुक्रिया
इक़बाल रिज़वी
lagta hai, Shishir-ji ne Hindi Film Music ke Mahasaagar mein gehrai tak khoob gote lagaaye hain.
-MD Soni, Jaipur
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